Saturday, December 18, 2021

*यूँ ही कोई मिल गया था**

**यूँ ही कोई मिल गया था**

“यूँ ही कोई मिल गया था, सरे राह चलते चलते” फिल्म पाकीज़ा, निर्माता, निर्देशक, कहानीकार, कलाम अमरोही, नायिका मीना कुमारी, नायक राजकुमार, गायक स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, गीतकार कैफ़ी आज़मी, संगीतकार गुलाम महोम्मद, पृष्ठभूमि में गुजरती रेलगाड़ी की कूऊऊऊऊ की ध्वनि एक अद्भुत समिश्रण, एक कालजयी गीत बन गया. सन 1972 में यह फिल्म आयी थी. शुरुआत धीमी थी पर फिल्म रिलीज होने के कुछ समय पश्चात ही मीना कुमारी की मृत्यू हो गयी, यह उनकी अंतिम फिल्म थी जो रिलीज हुई थी. पर इसके पश्चात ही फिल्म सुपर हिट हो गयी. इस फिल्म को बनने में 14 वर्ष लगे थे, फिल्म शुरु हुई थी तब ब्लैक एंड व्हाइट थी, नायक अशोक कुमार थे, संगीत निर्देशक गुलाम महोम्मद थे, कमाल अमरोही पति पत्नी थे, पर बाद में तलाक हो गया था, इस बीच रंगीन सिनेमा का जमाना आ गया तो फिर से शूटिंग प्रारम्भ हुई, अशोक कुमार की उम्र ढल गयी थी, इसलिये उनका किरदार बदला गया और नायक के रूप में राजकुमार आये, इसलिये कहानी में भी बदलाव किया गया, संगीतकार के रूप में नौशाद आये क्योंकि गुलाम महोम्मद अस्वस्थ हो गये थे. पर कुछ में उनका ही संगीत था और वह किसी प्रकार से रिकार्डिंग के लिये आये थे. पर फिल्म के सभी संगीत व गीत अति उत्तम थे. उपर से मीना कुमारी का मुज़रा, उसने तो सदैव ही कमाल किया था. इसके अतिरिक्त मीना कुमारी जब पत्र पढ़ती है, राजकुमार की नेपत्थ्य में गूंजती दमदार आवाज “आपके पाँव देखे, बहुत हसीन हैं, इन्हें जमीन पर न उतारियेगा, मैले हो जायेंगे” एक कालजयी संवाद बन गया.

 “अजीब दास्तां है ये, कहाँ शुरु कहाँ खतम, ये मंजिलें हैं कौन सी, न वो समझ सके न हम” महज़बीं बानो उर्फ मीना कुमारी के जीवन की दास्तां भी अजीब है, उन्ही पर फिल्माया गया “दिल अपना और प्रीत पराई” का यह गीत उनके जीवन को परिभाषित करता है. फिल्म में निभाये गये अधिकतर किरदार की भांति दुखोँ से भरपूर है. उन्हें मीना कुमारी का नाम फिल्म निर्माता विजय भट्ट ने दिया था, जब वह मात्र 7 वर्ष की उम्र में फिल्मों में काम करने के लिये प्रस्तुत हुई थी, फिल्म थी 1939 की “लेदरफेस” और महज़बीं बेबी मीना बन गयी. इनकी बड़ी बहन खुर्शीद व पिता अलीबख्श भी फिल्मों में छोटे मोटे रोल किया करते थे. कहते हैं जब मीना कुमारी के लिये भी फिल्मों में काम के लिये जब अली बख्श ने बच्ची को काम दिलवाने के लिये अशोक कुमार से निवेदन किया तब अशोक कुमार ने कहा “अभी तो तुम बच्ची हो जब बड़ी हो जाओगी, मेरी फिल्म में हीरोइन बनना”. तब सभी ने इस बात को मज़ाक में लिया पर समय के साथ यह सत्य सिद्ध हुआ. इनका मातृत्व सम्बंध रविंद्रनाथ टैगोर के परिवार से भी था. इनकी माता जी का नाम प्रभावती था व नानी का नाम हेमवती था जो टैगोर परिवार से थी. प्रभावती ने पहले प्यारेलाल मेरठी से विवाह किया व उनकी मृत्यू के पश्चात अलीबख्श से निकाह करके, धर्मपरिवर्तन करके उनका नाम इकबाल बानो हो गया. जब महज़बीं का जन्म हुआ तो इनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी, इसलिये कहा जाता है कि उनके पिता ने इन्हें एक अनाथालय के बाहर छोड़ दिया था. पर तुरंत चींटियां इनके शरीर पर आ गयी और बच्ची रोने लगी तो पिता अली बख्श ने वह आवाज सुनी, खून ने पुकारा, हृदय को झकझोरा और वह वापस लौट आये और बच्ची को गोद में उठा लिया. एक बेहतरीन अदाकारा से हम महरूम न हुए.

मीना कुमारी यह नाम सुनते ही मस्तिष्क में एक चित्र उभरता है, गहरी आंखे मानो दो छलकते जाम, गदराया हुआ बदन, बेहतरीन संवाद अदायगी, वह मात्र एक बार में ही आखों से ही वह कह जाती थी जिसे कहने के लिये अन्य कलाकारों को अनेक दृष्य करने पड़ते. कहते हैं कि दिलीप कुमार भी उनके समक्ष असहज हो जाते थे. मीना कुमारी का जिक्र हो तो “साहब बीबी और गुलाम” फिल्म का नाम न हो तो कोई भी लेख अधूरा ही समझा जायेगा. यह फिल्म मीना कुमारी की अद्भुत अभिनय क्षमता का साक्षात प्रमाण है. मीना कुमारी मात्र एक अभिनेत्री नहीं थी वह गज़ब की शायर भी थी. कहा तो यह भी जाता है कि उनकी मृत्यु के पश्चात गुलज़ार ने उनकी डायरी चुरा ली थी. पर इसके विपरीत यह भी कहा जाता है कि गुलज़ार की शायरी से प्रभावित होकर दोनों एक दूसरे के नज़दीक आ गये व मीना कुमारी ने अपनी डायरी गुलज़ार को दी थी.

 मीना कुमारी के जीवन में एक अधूरापन था, इसलिये इसे पूर्ण करने के लिये उन्हें एक भावनात्मक सम्बंध चाहिये था. उस वक्त सिने जगत में सैयद अमीर हैदर कमल नकवी उर्फ कमाल अमरोही का नाम उच्चा शिखर पर था. इससे प्रभावित होकर लगभग 19 वर्ष की मीना कुमारी ने दो बीबियों व तीन बच्चों के पिता, लगभग 34 वर्ष के कमाल से परिवार की इच्छा के विरुद्द 14 फरवरी 1952 को निकाह कबूल कर लिया. पर यह रिश्ता रिसता गया. कमाल अमरोही मीना कुमारी की बढ़ती लोकप्रियता, प्रभाव से असहज थे. वह अपने विशेष विश्वास पात्रों को मीना कुमारी पर नज़र रखने के लिये नियुक्त किये हुए थे. जिससे मीना कुमारी बहुत आहत हुई. उनके मेकअप रूम में किसी पुरुष के जाने की मनाही कमाल अमरोही ने लगा दी. जब मीना कुमारी ने विरोध किया तो  कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को भी तीन तलाक का शिकार बना दिया. अब उन्होंने विद्रोह स्वरूप अनेक पुरुषों से सम्बंध स्थापित कर लिये. जिनमें से धर्मेंद्र भी थे. कहा जाता है कि धर्मेंद्र जो प्रणय दृष्यों में असहज महसूस करते थे उन्हें मीना कुमारी ने ही अभिनय की बारीकियां समझाई और दोनों ही निकट आ गये. मीना कुमारी के साथ ही “फूल और पत्थर” से संघर्ष करते धर्मेंद्र सुपर स्टार बन गये. इसके अतिरिक्त दोनों शेर-ओ-शायरी करने लगे और शराब पीने के आदि हो गये क्योंकि मीना कुमारी तो पहले से ही कमाल अमरोही से दिल टूट जाने के बाद से सार्वजनिक रूप से भी शराब पीने लगी थी. उन्हें इसी कारण लीवर सिरोसिस नामक बिमारी हो गयी थी.

उनके लिखे चंद शेरों से लेख की समाप्ति करना चाहता हूँ जो उनके साहित्य सृजन व जीवन की व्यथा से परिचित कराते हैं:

चांद तन्हा है आसमां तन्हा,दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा!

बुझ गयी है आस, छुपा तारा, थरथराता रहा, धुआं तन्हा!!

और फिर “खुद में महसूस हो रहा है जो, खुद से बाहर है तलाश उसकी”.

बाहरी जगत, रजतपट की चकाचौंध, यश व अथाह धन, ऐश्वर्यशाली, विलासिता, भव्य अट्टालिकाओं के एक अतिरिक्त यहाँ की अंधेरी गलियों से अंजान है. इन्हीं अंधेरी गलियों में भटककर 31 मार्च, 1972 को, मात्र 38 वर्ष की उम्र में मीना कुमारी करोड़ों प्रशंसको के नेत्रों को अश्रुपूरित करते हुए, इस फ़ानी दुनिया से रुखसत हो गयी.

(विभिन्न स्रोतों से प्राप्त लेखों, चित्रों के लिये आभार सहित एक संकलन)
साभार : सुनीता सोलंकी 'मीना'

Sunday, March 7, 2010

भांवर -- पारिवारिक छत्तीसगढ़ी फिल्म जरुर देखे...











बहुत दिनों के बाद एक छत्तीसगढ़ी फिल्म भांवर आई है। भांवर का मतलब दरिया तालाब वाले भंवर से कतई नहीं है। इस भांवर का मतलब शादी के समय होने वाले सात फेरो से है। शमानिधि की भांवर में पारिवारिक ड्रामा है। फिल्म का टेम्पो फास्ट रखा गया है। गीत-संगीत मधुर और कर्णप्रिय है। मैंने पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म देखी। विश्वास कीजिये मुझे अफ़सोस हुआ की पहले कोई छत्तीसगढ़ी फिल्म क्यों नहीं देखी। मै मेटिनी प्रेस शो में आमंत्रित था। लेकिन किसी कारणवश आखिरी शो देखने पहुंचा। मेरे लिए ये गर्व की बात थी की मैने फिल्म की नायिका डोल्ली तोमर के साथ मिलके यह फिल्म देखी। साथ में मेरे पत्रकार दोस्त गिरीश गुप्ता, सेवक कुकरेजा, महेश , रवि रंगलानी और संतोषजी थे। फिल्म यूनिट से राजा दासवानी , प्रोडूसर शमानिधि मिश्रा, नायिका डोल्ली तोमर आदि भी थे। फिल्म शुरू से आखिरी तक थ्रिलर की तरह तेज चलती है। गानों की वजह से कहानी को सपोट मिलता है। गानों के लोकेशन दर्शनीय है। गानों का फिल्मांकन आकर्षित करता है। फिल्म में आम छत्तीसगढ़ी फिल्म की तरह मसाले भी भरे गए है। लड़ाई के सीन मद्रास चेन्नई के फाइट मास्टर एस बाबू ने फिल्माए है। फिल्म में गलतिया भी है। पर चूकि फिल्म बहुत अच्छी बन पद है इसलिए छोटी मोती गलतियों को नज़र अंदाज़ किया जा सकता है। नवोदित नायिका डोल्ली तोमर की अपेक्षा मोना सेन को ज्यादा फुटेज देना निर्माता की मजबूरी कही जाएगी। हालाँकि मोना ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है पर दर्शक डोल्ली को देखना ज्यादा पसंद कर रहे है।




फिल्म के नायक अनुज शर्मा ने अपना काम भली भांति किया है। अनुज में आगे बढ़ने की ललक है। किसी भी सीन में वो ओवर रेअक्ट नहीं करता। लड़ाई के सीन में वह कमाल का एक्शन करता है। प्रेम सीन में भी वह सहज सरल और स्वाभाविक है। इस फिल्म की जान है अनुज। नायिका डोल्ली का प्रदर्शन भी आकर्षित करता है। गानों में वह बेहद खूबसूरत लगी है। हा विधवा के रोल से वह न्याय नहीं कर पाई है। बगैर मेक उप के डोल्ली बेकार लगती है। प्रकाश अवस्थी ठीकठाक है। वे अब अपनी उम्र से बड़े लगने लगे है। सोना ने दिखा दिया है की उसमे बुरी औरत के सारे गुण है। छत्तीसगढ़ी फिल्मो की वह अगली बिंदु या ललिता पवार का रोल कर सकती है। शमा निधि इस फिल्म की सबसे पलुस पॉइंट है। कॉमेडियन के रूप में शमा ने समां बांध दिया है। शमा कही पर भी वलगर नहीं लगते है। शमा एक बहुर्मुखी प्रतिभा है। प्रोडूसर निर्देशक गायक और कॉमेडी तीनो रोल में वह पर्फक्ट है। फिल्म को छत्तीसगढ़ के गंगरेल, चित्रकूट और तिरथ्गढ़ के लोकेशन में फिल्माया गया है। कैमरा में तोरण राजपूत ने गज़ब का काम किया है। भांवर के गीत तो अभी से लोकप्रिय हो गए है--दद्दा रे..कुकुर जी की जय हो.... सारा रा रा....और सुआ गीत .... पण दुकानों से लेकर शादी मंडपों में सुने जा सकते है। आखिरी में खलनायक ke रोल की चर्चा के बिना समीक्षा अधूरी लगेगी। रजनीश ने खलनायक की भूमिका में जान दल दी है। रजनीश की हर अदा रंजित अमजद खान और प्राण के इर्द गिर्द लगती है। कही कही वह जरुरत से ज्यादा शोर करता नज़र आता है। रजनीश का भविष्य उज्जवल नज़र आता है।

Thursday, February 4, 2010

maya de de mayaru...film ki shhoting report.....


maya de de mayaru.....film ki shooting photo...........