Sunday, March 7, 2010

भांवर -- पारिवारिक छत्तीसगढ़ी फिल्म जरुर देखे...











बहुत दिनों के बाद एक छत्तीसगढ़ी फिल्म भांवर आई है। भांवर का मतलब दरिया तालाब वाले भंवर से कतई नहीं है। इस भांवर का मतलब शादी के समय होने वाले सात फेरो से है। शमानिधि की भांवर में पारिवारिक ड्रामा है। फिल्म का टेम्पो फास्ट रखा गया है। गीत-संगीत मधुर और कर्णप्रिय है। मैंने पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म देखी। विश्वास कीजिये मुझे अफ़सोस हुआ की पहले कोई छत्तीसगढ़ी फिल्म क्यों नहीं देखी। मै मेटिनी प्रेस शो में आमंत्रित था। लेकिन किसी कारणवश आखिरी शो देखने पहुंचा। मेरे लिए ये गर्व की बात थी की मैने फिल्म की नायिका डोल्ली तोमर के साथ मिलके यह फिल्म देखी। साथ में मेरे पत्रकार दोस्त गिरीश गुप्ता, सेवक कुकरेजा, महेश , रवि रंगलानी और संतोषजी थे। फिल्म यूनिट से राजा दासवानी , प्रोडूसर शमानिधि मिश्रा, नायिका डोल्ली तोमर आदि भी थे। फिल्म शुरू से आखिरी तक थ्रिलर की तरह तेज चलती है। गानों की वजह से कहानी को सपोट मिलता है। गानों के लोकेशन दर्शनीय है। गानों का फिल्मांकन आकर्षित करता है। फिल्म में आम छत्तीसगढ़ी फिल्म की तरह मसाले भी भरे गए है। लड़ाई के सीन मद्रास चेन्नई के फाइट मास्टर एस बाबू ने फिल्माए है। फिल्म में गलतिया भी है। पर चूकि फिल्म बहुत अच्छी बन पद है इसलिए छोटी मोती गलतियों को नज़र अंदाज़ किया जा सकता है। नवोदित नायिका डोल्ली तोमर की अपेक्षा मोना सेन को ज्यादा फुटेज देना निर्माता की मजबूरी कही जाएगी। हालाँकि मोना ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है पर दर्शक डोल्ली को देखना ज्यादा पसंद कर रहे है।




फिल्म के नायक अनुज शर्मा ने अपना काम भली भांति किया है। अनुज में आगे बढ़ने की ललक है। किसी भी सीन में वो ओवर रेअक्ट नहीं करता। लड़ाई के सीन में वह कमाल का एक्शन करता है। प्रेम सीन में भी वह सहज सरल और स्वाभाविक है। इस फिल्म की जान है अनुज। नायिका डोल्ली का प्रदर्शन भी आकर्षित करता है। गानों में वह बेहद खूबसूरत लगी है। हा विधवा के रोल से वह न्याय नहीं कर पाई है। बगैर मेक उप के डोल्ली बेकार लगती है। प्रकाश अवस्थी ठीकठाक है। वे अब अपनी उम्र से बड़े लगने लगे है। सोना ने दिखा दिया है की उसमे बुरी औरत के सारे गुण है। छत्तीसगढ़ी फिल्मो की वह अगली बिंदु या ललिता पवार का रोल कर सकती है। शमा निधि इस फिल्म की सबसे पलुस पॉइंट है। कॉमेडियन के रूप में शमा ने समां बांध दिया है। शमा कही पर भी वलगर नहीं लगते है। शमा एक बहुर्मुखी प्रतिभा है। प्रोडूसर निर्देशक गायक और कॉमेडी तीनो रोल में वह पर्फक्ट है। फिल्म को छत्तीसगढ़ के गंगरेल, चित्रकूट और तिरथ्गढ़ के लोकेशन में फिल्माया गया है। कैमरा में तोरण राजपूत ने गज़ब का काम किया है। भांवर के गीत तो अभी से लोकप्रिय हो गए है--दद्दा रे..कुकुर जी की जय हो.... सारा रा रा....और सुआ गीत .... पण दुकानों से लेकर शादी मंडपों में सुने जा सकते है। आखिरी में खलनायक ke रोल की चर्चा के बिना समीक्षा अधूरी लगेगी। रजनीश ने खलनायक की भूमिका में जान दल दी है। रजनीश की हर अदा रंजित अमजद खान और प्राण के इर्द गिर्द लगती है। कही कही वह जरुरत से ज्यादा शोर करता नज़र आता है। रजनीश का भविष्य उज्जवल नज़र आता है।